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डोंगरगढ़, 17 मई. 2027/ डोंगरगढ़ के नक्सल पीड़ित परिवारों ने अब सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. नक्सली हिंसा में अपने परिवार के लोगों को खो चुके दर्जनों पीड़ित परिवारों ने साफ शब्दों में कहा है कि पहले नक्सलियों ने उनका घर उजाड़ा और अब सरकार ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया है. वर्षों से नौकरी, मुआवजा और पुनर्वास की मांग कर रहे इन परिवारों ने अब आंदोलन का रास्ता चुन लिया है. डोंगरगढ़ निवासी नक्सल पीड़ित धीरेंद्र कुमार साहू समेत कई परिवारों ने चेतावनी दी है कि यदि 21 मई 2026 तक उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो वे राजनांदगांव स्थित पुलिस महानिरीक्षक (IG) कार्यालय के सामने परिवार सहित अनिश्चितकालीन धरने पर बैठेंगे. पीड़ितों का कहना है कि यह सिर्फ प्रदर्शन नहीं होगा, बल्कि वादा निभाओ या जवाब दो की लड़ाई होगी.
अधिकारियों से केवल आश्वासन मिला, परिवारों का आरोप
खैरागढ़, मानपुर, मोहला और राजनांदगांव क्षेत्र के इन परिवारों का आरोप है कि नक्सलियों ने उनके पिता, पति और भाइयों को पुलिस मुखबिर बताकर मौत के घाट उतार दिया. घटना के बाद प्रशासन ने सहायता और सुरक्षा का भरोसा दिया था, लेकिन आज तक अधिकांश परिवारों को न सरकारी नौकरी मिली, न आर्थिक सहायता और न ही रहने के लिए जमीन. धीरेंद्र कुमार साहू ने कहा कि पीड़ित परिवार पिछले कई सालों से कलेक्टर, एसपी और दूसरे अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं. हर बार सिर्फ आश्वासन दिया जाता है, लेकिन फाइलें आगे नहीं बढ़तीं. उन्होंने कहा कि 14 मई 2025 को भी प्रशासन को आवेदन सौंपा गया था, लेकिन एक साल गुजरने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है.
पीड़ित परिवारों का कहना है कि सरकार ने नई नक्सल पुनर्वास नीति में बड़े वादे किए थे. कहा गया था कि नक्सल हिंसा में मारे गए लोगों के आश्रितों को नौकरी दी जाएगी, 3 लाख रुपए की सहायता राशि मिलेगी, रहने के लिए जमीन दी जाएगी और बच्चों की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति शुरू की जाएगी. लेकिन हकीकत यह है कि कई परिवार आज भी किराए के मकानों और रिश्तेदारों के भरोसे जिंदगी काट रहे हैं. परिवारों ने यह भी आरोप लगाया कि जिन बच्चों के भविष्य को बचाने की बात सरकार कर रही थी, वही बच्चे आर्थिक तंगी की वजह से पढ़ाई छोड़ने की स्थिति में पहुंच गए हैं. कई परिवार ऐसे हैं जिनके पास स्थायी आय का कोई साधन नहीं बचा.
अब इन पीड़ित परिवारों ने साफ कर दिया है कि वे केवल आश्वासन सुनने नहीं आएंगे. उनका कहना है कि अगर 21 मई तक मांगें पूरी नहीं हुईं तो पूरा परिवार IG कार्यालय के सामने डेरा डाल देगा और आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार जवाब नहीं देती.नक्सल प्रभावित परिवारों के इस ऐलान ने प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है. क्योंकि पहली बार इतने बड़े स्तर पर नक्सल हिंसा से प्रभावित लोग संगठित होकर खुला आंदोलन करने जा रहे हैं. ऐसे में यह मामला अब सिर्फ पुनर्वास का नहीं, बल्कि सरकार की नक्सल नीति और उसके जमीनी अमल पर भी बड़ा सवाल बनता जा रहा है.