आकाशवाणी.इन
नई दिल्ली, 30 अप्रैल 2026/ सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आमने सामने की टक्कर के मामले में मोटर दुर्घटना दावों में आंख मूंदकर सिर्फ एक पक्ष को दोषी ठहराकर लापरवाही तय नहीं की जा सकती। इसके बजाय इसमें शामिल सभी पक्षों के आचरण का संतुलित, निष्पक्ष और तुलनात्मक मूल्यांकन किया जाना चाहिए। वर्ष 2009 के एक जानलेवा सड़क दुर्घटना मामले में मुआवजे के दावों को खारिज करने का फ़ैसला रद करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और विजय बिश्नोई की पीठ ने माना कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) और पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा रोडवेज के बस चालक की भूमिका की ठीक से जांच किए बिना दुर्घटना का पूरा दोष सिर्फ मृत कार चालक पर डाल दिया, जो एक गलती थी.
शीर्ष अदालत ने इस मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए एमएसीटी, भिवानी को वापस भेज दिया। साथ ही टिप्पणी की कि निचली अदालतों द्वारा अपनाया गया दष्टिकोण मोटर दुर्घटना मामलों में लापरवाही से जुड़े स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। शीर्ष अदालत ने कहा, ”लापरवाही का निर्धारण इसमें शामिल सभी पक्षों के आचरण के संतुलित और निष्पक्ष मूल्यांकन पर आधारित होना चाहिए, खासकर उन परिस्थितियों में जहां जिम्मेदारी दोनों पक्षों की होने की संभावना हो।” यह मामला 13 जनवरी, 2009 को हरियाणा के बालम्भा मोड़ के पास हुई एक दुर्घटना से जुड़ा है। इस दुर्घटना में हरि ओम और शेर सिंह की मौत हो गई थी, जब उनकी कार की सामने से आ रही हरियाणा रोडवेज की बस से आमने-सामने टक्कर हो गई थी। हरि ओम की विधवा प्रमिला और अन्य कानूनी वारिसों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.